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17.1.10

7 "अँकल जी" आजाद भारत की सबसे बड़ी खोज

यूरेका-यूरेका, मिल गया. बहुत दिनो से जिसको मै खोज रहा था आज वह मिल गया. अँकल जी एक शख्शियत हैँ जो पूरे भारत को represent करते हैँ. ये हमेशा और हर जगह मौजूद रहते हैँ. अँकल जी जो केरल मे भी हैँ और बिहार मे भी. जो आसाम की गलियोँ मे भी रहते हैँ और बँगलोर के MG Road मे भी. जो भूत-प्रेत को भगाने वाले अनुष्ठान मे भी काम आते हैँ और मदहोश कर देने वाली पब के माहौल मे भी मौजूद रहते हैँ. जी हाँ, अँकल जी ही हैँ जो भारतीय के तन मन धन मे बस गए हैँ.

जी हाँ अग्रेजी के एक शब्द "अँकल" और हिन्दी के अलँकार से मिलकर बना यह शब्द हर जगह मौजूद है. इस शब्द का प्रयोग जितना होता आया है शायद ही उतना प्रयोग किसी और शब्द का किसी भी भाषा मे हुआ होगा. आप किसी भी गँजे अधेर आदमी को इस नाम से पुकार सकते हैँ. परम्परा ऐसी कि वह आदमी आपको oblige करेगा ही. आपका उम्र कुछ भी हो, आप राह चलते किसी भी आदमी से जिसके हाथ मे घड़ी लगा हो, अँकल जी कहकर आप समय पुछ सकते हैँ, आपको सही जानकारी मिलेगी. आप राह भटक गए हैँ, आपको कोई ना कोई अँकल जी मिल ही जाँएगेँ जो आपको सही राह दिखा देँगे. चाहे वह राह शहर का हो या कैरियर का.

यदि आप यूवा हैँ तो आपका प्रतियोगी जरूर आपके अँकल जी के घर मे रह रहे होँगे. ऐसा कोइ यूवा नही होगा जो इश्क फरमाने के लिए किसी ना किसी अँकल जी के घर नही गए होँ. ऐसा कोइ यूवा नहीँ जो किसी ना किसी अँकल जी के प्रकोपभाजन का शिकार नही हुए होँ. और ऐसा कोइ युवा नहीँ जिसको कोई ना कोइ अँकल प्रोत्साहित ना किया हो. आपके अँकल जी का बच्चा आपसे हमेशा होशियार होता है. वह हमेशा आपके लिए उदाहरण बनकर बैठा हुआ होता है. प्रत्येक माँ बाप को किसी ना किसी अँकल जी के बच्चे से इर्ष्या रहता है.

यदि आपका कोई काम अटक गया हो, आपके लिए कोई ना कोई अँकल जी मौजूद रहते हैँ. यदि आपको कोई सज्जन किसी भी प्रकार का सहायता किया हो तो आपका यह दायित्व बनता है कि आप उसे अँकल जी कह कर बुलाएँ. यदि आप उसे अँकल जी का दर्जा नही देते हैँ तो बोला जाएगा कि आपकी परवरिश ढँग से नही हुई है. जब आप अपने से एक पीढ़ी उँचे लोगोँ को सम्बोधित कर रहे होते हैँ, अपने वाक्योँ, कथनोँ को अँकल शब्द से जोड़ेँ. प्रत्येक पूर्णविराम, अर्द्धविराम, और अल्प विराम के बाद अँकल जी लगाना आपकी जिम्मेदारी बनता है, नही तो अपको अन्यथा लिया जाएगा. आप अँकल जी का प्रयोग कब और कहाँ करते हैँ उससे आपके सँस्कार का पता चलता है. और आपके सँस्कार का परीक्षण करने के लिए हर जगह कोई ना कोई अँकल जी मौजूद रहते ही हैँ.

भारत के प्रत्येक शादी व्याह और पार्टीयोँ मे अँकल जी मौजूद रहते हैँ. उन अँकल जी को उस प्रत्येक यूवा से चिढ़ होता है जो पार्टी मे यूवतीयों का सामीप्य चाहते हैँ. यदि इनको पता चल जाता है कि कोई यूवा किसी विपरीत लिँगी के नजदीक आया है तो ऐसे अँकल जी सिर्फ एक ही सवाल करते हैँ, "पढ़ाई लिखाई कैसा चल रहा है बेटा". ऐसे प्रत्येक अँकल जी को अपने जमाने का पढ़ाई अच्छा लगता है. यदि सँयोगवश आप पढ़ाई लिखाई मे अच्छे हैँ, तो ऐसे अँकल जी उन पार्टियोँ मे हर सँभव प्रयास करते हैँ कि प्रमाणित हो जाए कि आजकल का मानदण्ड नीचे हो गया है. उनको अपने जमाने की गणित, अँग्रेजी हमेशा ही आज की अपेक्षा मजबूत मालूम होता है. ऐसा कदाचित ही होता है कि यूवकोँ को पढ़ाई लिखाई का झाँसा देकर भगाने वाले ऐसे अँकल जी की वक्र नजरोँ से किसी यूवती शरीर बच गया हो. ऐसे प्रत्येक अँकलजी सुन्दर यूवती को "बेटा" कहकर बुलाते हैँ. और कम सुन्दर यूवती से ये अँकल लोग हमेशा शरमाते हैँ.

अँकल जी का प्रयोग आप अपने सुविधानुसार कर सकते हैँ. भारत के प्रत्येक भाषा आपको अधिकार देता है कि आप अपने सँस्कारित होने का परिचय अँकल शब्द के प्रयोग से कर सकते हैँ. साथ ही सभी भाषाओँ मे अँकल शब्द का प्रयोग आप बदला लेने के लिए भी कर सकते हैँ. मसलन यदि आपसे छोटा अपनी वाक्पटूता से छका गए होँ और आप बदला लेने के लिए छटपटा रहे होँ तो बस बोल दीजिए, "अँकल जी मै हार मान गया", देखिए कैसा असर करता हो. यदि आप कोई छोटा मोटा मजाक करना चाहते होँ अपने साथी को अँकल जी कह कर देखिए.

समय-काल और परिवेश से अँकल जी का स्वरुप बदलता रहता है. हिन्दीभाषी बीमारु राज्य मे जहाँ ये अपना वर्तमान स्थिति (अँकल जी) बनाए रखते हैँ. वहीँ तमिलनाडू मे आकर यह यँकल जी हो जाते हैँ. बँगलोर की गलियोँ मे जहाँ "एँकल जी के नाम से जाने जाते हैँ, वही केरल के बच्चे बहुत ही चाव से इन्हे "इँकल जी" बुलाते हैँ. माटी और पानी के बदलने से अँकल जी का स्वरुप बदल जाता है.

२६ जनवरी आने वाला है. हमलोग स्वतँत्रता और फिर सँप्रभुता की ६१वीँ वर्षगाँठ मनाने वाले हैँ. मैने भारतवर्ष के पिछले साठ साल मे हुए बदलाव के बारे मे लेखा जोखा लेने की कोशिश करने लगा. सोचा पिछले साठ साल मे हमने क्या उपलब्धि हाँसिल किया. दिमाग पचास के दशकोँ मे आनाज की कमी से लेकर चँद्रायन परियोजना तक गया, साइकिल की सवारी से मेट्रो तक गया, अँधविश्वास अश्पृयता से लेकर इन्फोरमेशन टेकनोलोजी तक गया. सोचा, दुनियाँ बहुत तरक्की कर गई तो हमने किया तो क्या किया. दुसरी बात ये कि, यदि हम गाँव जाकर देखेँ तो शहर की चकाचौँध से ये अभी भी कोसोँ दूर है. गाँधी जी आकर देखेँ तो उनको लगेगा, भारतीय सभ्यता वहीँ है जहाँ वह छोड़ कर गए थे. लेकिन अँकल जी अपने तमाम कन्ट्रोवर्सी के बावजूद देश को जोड़े हुए हैँ. कश्मीर से कन्याकुमारी, और बँगाल की खाड़ी से गुजरात तक प्रत्येक भाषा, जाति, धर्म और वर्ग के लोगोँ मे ये विद्यमान रहकर अनेकता मे एकता का परिचय देते हैँ.

मुझे मालूम है, हिन्दी ब्लोग्स मे भी कुछ अँकल जी हैँ. सभी से यही अर्ज करुँगा, "अँकल जी, एक टिप्पणी आप इस ब्लोग पर भी दे देँ". वे सभी लोग जो आज तक इस ब्लोग को पढ़ने बावजूद भी टिप्पणी नही देते हैँ, "मैँ उनको बोलूँगा, अँकल जी, थोड़ा तो रहम करो. बच्चे की जान लेने से पहले टिप्पणी तो दे दो. और उन सभी लोगोँ को जो टिप्पणी देते आएँ मै यही बोलूँगा, "बँधूओ, मुझे आशा है आप मुझे अँकल कहने का मौका नही देँगे, कृपया एक टिप्पणी तो दे ही देँ".

31.10.09

5 हैलोवीन: अमेरिका मे भूत पिचास और झाड़-फूक का त्योहार

दो साल से खामोशी बरकरार रखने के बाद बकवास का ये दूसरा खेप है. लेकिन अभी तक ये अपने बीटा सँस्करण से आगे नहीँ बढ़ पाया है. इस दूसरे खेप मे मै टीवी पत्रकारोँ की बाट नही लगाउँगा. अब उनका स्तर इस ब्लोग से नीचे गिर गया है. सच्ची ! बकवास अपने आप मे एक परिपूर्ण विधा है. और पत्रकारोँ को बाट लगाने से ही केवल, बकवास फल फूल नही सकता है. लेकिन बकवास के इस द्वितीय सँस्करण को कहीँ ना कहीँ से शुरु करना है. बहुत देर से सोच रहा था क्या लिखूँ...? तो याद आया क्योँ नही अपने अमेरिका प्रवास के बारे मे ही लिखूँ. इस बार के मै अपने अमेरिका प्रवास मे तीन जगह गया हूँ. दो शहर अभी और बाँकी है. अगले दो सप्ताह मे काम निपटा के जल्दीए लौटते हैँ. ये सब मिलाकर मेरा पाँचवाँ प्रवास है, मै जब भी यहाँ आया हूँ, कुछ ना कुछ मुझे अजीबे देखने को मिला है. अक्टूबर मे अन्तिम सप्ताह मे किसी भी पश्चिमी देश मे रहने का ये पहला अवसर है. हमेशा की तरह इस बार भे अजीब अजीब चीजेँ देखने को मिल रही है.



प्रत्येक साल अक्टूबर महीने के अन्तिम सप्ताह से अमेरिका मे त्योहारोँ का दौर शुरु हो जाता है. पहला त्योहार आता है हैलोविन, फिर थैन्क्स गिविँग और उसके बाद क्रिश्मस और नया साल. आपने हैलोविन के अलावा सभी त्योहारोँ का नाम सुन रखा होगा. और आपको ये जानकर बहुत आश्चर्य होगा कि हैलोविन एक ऐसा त्योहार है जिसमे अमेरिकन लोग भूत-प्रेतोँ की पूजा (झाड़-फूक) करते हैँ. यदि सँस्कारित शब्दोँ मे बोलेँ तो यह पूजा करना ही है लेकिन यदि असलियत मे बोलेँ तो यह झाड़ फूक से ज्यादा कुछ नही है. और इस झाड़ फुक के लिए आफिस से बकायदा छुट्टी मिलता है. लेकिन अमेरिकन ठहरे पहले दुनियाँ के लोग. वो ये बात कैसे मानेँगे कि अमेरिका मे भूत प्रेत और जादू टोना होता है. और प्रत्येक चीज मे इन्जोय करने का उनका आदत है, तो भूत-प्रेत के झाड़-फूक से भे ये लोग मस्ती करना नही भूलते. और बात यहाँ तक बढ़ जाता है कि लोग हैलोविन का असली मकसद भूल जाते हैँ.
मैने लिटरेचर खँगालने की कोशिश किया कि आखिर बात क्या है? तो पाया कि, प्राचीन समय से हैलोविन त्योहार के समय मरे हुए लोगोँ की आत्मा को शाँत करने के लिए ऐसा पूजा किया जाता है.

विकीपीडिया के अनुसार "यह एक ऐसी अवधारणा है जिसमे यह माना जाता है कि अक्टूबर के अन्तिम सप्ताह मे इस पृथ्वी लोक मे और स्वर्ग-नरक लोक मे दूरी कम हो जाती है. ये दूरी इतनी कम हो जाती है कि स्वर्ग लोक से अपने अच्छे अच्छे पूर्वज के साथ नरक लोक के भूत, प्रेत और पिचाश पृथ्वी लोक पर विचरण करने लगते हैँ. अमेरिकन लोग अपने पूर्वजोँ के आत्मा का तहे दिल से स्वागत करते हैँ और इसी खुशी मे इस हैलोविन को त्योहार की तरह मनाते हैँ, खुशियाँ मनाते हैँ. लेकिन भूत, प्रेत और पिचाशोँ को भगाने के लिए जादू टोना करते रहते हैँ.

जादू टोना के लिए तरह तरह का हरकत करते हैँ और इसमे सबसे बड़ा काम आता है कद्दू (pumpkin). काद्दू को काटकर उसमे आँख और मुँह के आकार का डिजायन बनाया जाता है. बाँकी चीजोँ को नारँगी और काले रँग से सभी चीजोँ को सजाया जाता है. प्रेतोँ और पिचासोँ को भगाने के लिए बच्चे बुढ़े अजीब अजीब रँग के कपड़े पहनते हैँ. हलाँकि अधिकतम डिजायन काले और नारँगी रँग से होता है.

पूरा व्यवस्था देखने से ऐसा लगता है कि अपने देश ही आ चुके होँ. अमेरिकन लोग भारतीय ओझा की तरह का कपड़ा पहनते हैँ. सभी लोगोँ मे होड़ लगी रहती है कि सबसे बदसूरत कौन दिखता है. ऐसा मानना है कि जितना बदसूरत दिखो बुरी आत्मा उतना ही दूर रहेगा. मैने अपने आफिस के बाहर आज देखा कि कुछ लोक बँगलोर के सिल्क बोर्ड किनारे जो बहुरुपिया होते है उसके जैसा कपड़े पहन रखे हैँ. एक समुह ऐसा था जो हाथो पर पट्टी मरहम और प्लास्टर जैसा कुछ करवा रखा है. बहुत सारे लोग आर्टिफिशियल बाल लगा रखे हैँ.

जब मानवता का विकास हो रहा था तो ऐसा नही है कि अमेरिका मे विकास दर बहुत तेजी से बढ़ा है. इन्टरनेट पर एक आर्टिकल पढ़ रहा था कि द्वितीय विश्व यूद्ध के समय अमेरिका ने परमाणु बम जरूर बना लिया था लेकिन मिरगी का इलाज आयोवा स्टेट यूनिवरसिटी के एजूकेशन विभाग का एक प्रोफेसर अपने झाड़-फूक से ही करता था बाइअबिल के सहयोग से.


आज का बकवास कैसा लगा टिप्पणी द्वारा बताइएगा.

26.2.08

17 अब बड़े बड़े विद्वानों मे मेरा नाम भी शामिल

दोस्तों, आपको बताते हुए मुझे आपार खुशी मिल रही है, कि अब मेरा नाम भी भारत के बड़े बड़े विद्वानो मे शामिल हो जाएगा. मुझे बधाई दीजिए, आप अपने दोस्तों, रिश्तेदारों, सड़क पर चलते हुए आम नागरिक सब को बताइए कि पद्मनाभ अब विद्वान हो गया है. उसके चेहरे से विद्वता झलकती है. यदि आप मेरे मोहल्ले से ताल्लूक रखते हैं तो शर्मा आन्टी, तिवारी अन्टी इत्यादि लोगो को यह बात बता दीजिए कि मै अब विद्वान हो गया हूं. मेरा नाम अब पेपर मे छपवाइए, मेरे नाम से अब आप गली मोहल्ले का नाम रखिए. मेरे नाम से फ्लाईओवर, राष्ट्रीयराजमार्ग इत्यादि का नामकरण कीजिए. ऐँ क्या? आप विद्वानों का सम्मान नही करेंगे? क्या विद्वता इस देश मे नही पूजी जाएगी? आप लोग पढ़े लिखे हैं यदि आप लोग नही विद्वानों का सम्मान करेंगे तो और कौन करेगा.

अब आप पुछेँगे, "ठीक है, ठीक है! हम विद्वानों का सम्मान करेंगे! लेकिन भैय्या एक बात तो बताओ तुम विद्वान तो लगते नही. अपने तीस साल के जिन्दगी मे तुमने ऐसा क्या कर डाला कि हमलोग तुम्हें विद्वान समझने लगें, कौन सा सेब को पेड़ से गिरते हुए देखा है तुमने? जरूर तुमको विद्वान होने का भ्रम हुआ है".

जी नहीं, मुझे विद्वान होने का भ्रम नही हुआ. मैं विद्वान होने ही वाला हूँ. मुझे अभी से एहसास होने लगा है कि मेरे व्यक्तित्व से विद्वता झलकती है. ये और बात है कि मैने किसी सेब को किसी पेड़ से गिरते हुए नही देखा है और न ही मै आधूनिक समाज का नया सिद्धान्त ही दिया हूँ. रोजी रोटी के लिए आम आदमी की तरह भटकता रहता हूँ, लेकिन मेरी अन्तरात्मा ने मुझे एहसास कराया है कि मै विद्वान हूँ. मेरे अवचेतन मस्तिष्क मे यह रच बस गया है कि मै अब विद्वान की सारी विद्वता अपने अन्दर सँजोए हुए हूँ.

अब आप बोलेँगे कि ज्यादा मत पकाओ, सही सही बताओ कि आखिर बात क्या है. नही तो इस ब्लोग को यहीँ पढ़ना छोड़ हम कट लेते हैँ.

जी नही आप ऐसा मत कीजिए, एक विद्वान की विद्वता को इस तरह अपमानित मत कीजिए. चलिए मै आपलोगों को विस्तार से बताता हूँ कि आखिरकार मै विद्वान क्यों?

बचपन से मेरे मस्तिष्क मे एक अवधारणा बैठी थी कुछ लोगों के पेशा के हिसाब से उनको विद्वान बोला जाए. जैसे कि कोई वैज्ञानिक. पहली बार जब अब्दुल कलाम के बारे सुना था कि वे एक वैज्ञानिक हैँ तो मेरा मन उन्हे भी विद्वान समझ लिया था. बचपन के शिक्षा के आधार पर मेरे हिसाब से विद्वानों के श्रेणी मे कुछ और पेशेवर लोग भी आते हैं मसलन बड़े विश्वविद्यालय के प्रोफेसर, बड़े बड़े लेखक, कवि, बड़े बड़े अस्पताल के डाक्टर और पत्रकार.

जी हाँ जब भी मेरे मस्तिष्क मे एक पत्रकार का नाम कौधाँ, चूड़ीदार पैजामा लम्बा कूर्ता और बाटा का चप्पल पहने एक ऐसे शख्स का इमेज सामने आया, जिसके पास दुनियाँ की हर जानकारी होती थी, एक ही पत्रकार जो आन्सटीन के खोज पर अपना ऐसा विचार व्यक्त कर सकता है जिसके बारे मे आइन्स्टीन कभी सोच भी नही सकता था, पत्रकार समाज शास्त्र मे अरस्तू और सूकरात को छक्के छुड़ा दें, एक ऐसा इमानदार चेहरा जो अकेले ही समाज मे क्रान्ति लाने के लिए काफी हो. एक ऐसा व्यक्तित्व जो अपनी इमानदारी के आगे कभी भी ना झुके.

तो मेरी बचपन की दुनियाँ बदल गई और इसमे रहने वाले लोग भी. लेकिन विद्वान वैसे के वैसे ही. विद्वता की परिभाषा अब भी नही बदली. आज भी समाज मे एक वैज्ञानिक विद्वान के नजर से ही देखे जाते हैँ. तो आज भी एक वैज्ञानिक, विश्वविद्यालय के प्रोफेसर, और कवि-लेखक इत्यादि सब विद्वानों के श्रेणी मे ही गिने जाते हैँ. जी हाँ और इस इत्यादि मे पत्रकार महोदय भी शामिल हैँ, खास तौर पर इन टी.वी. मे न्यूज पढने वाले (वाली) सारे पत्रकार.

एक बार आप इन टी.वी न्यूज रीडर के चेहरे को ध्यान से देखिए, सबको यह अन्दर से फील होता हुआ मालूम होगा कि उनके अन्दर विद्वता कूट कूट कर भरी है. परचून के दूकान से अभी अभी डेढ़ किलो विद्वता खरीदकर लाए हैँ और गटा गट अपने अन्दर कर लिए हैँ और वही विद्वता अब दर्शको को फील करबा रहे हैं. आप उनको पोले और मूर्ख प्रेजेन्टर समझते रहेँ, आप अपनी बला से, उनको तो तीन रुपैय्ये चार आने प्रति किलो की दर से विद्वता परचून की दूकानों मे ही मिल जाती है और अपनी विद्वता को फील करवाने के लिए दर्शक मिल ही जाते हैँ.

दोस्तोँ अब विद्वान होने के लिए वर्षोँ का मेहनत नही चाहिए. विद्वान होने के लिए बाल का सफेद होना भी जरूरी नही है. ना ही बहुत पढाई करने की. विद्वान होने के लिए इमानदार भी होना जरूरी नही है. जब पत्रकार लोगोँ ने उस परचून के दूकान का पता हमे दे ही दिया तो मैने सोचा विद्वता अभी सस्ती मिल रही है. अभी खरीद कर अभी विद्वान हो लेते हैँ, ना जाने आगे यदि फिर से विद्वता महगी हो गयी तो मुझे विद्वान होने का मलाल रह ही जाएगा. आजतक पर कुछ दिन पहले पुण्य प्रसून बाजपेई जी विद्वान बने थे, फिर दीपक चौरसिया विद्वान बने हैँ, मैने अभी कल ही देखा है एक नया विद्वान आज-तक पर आया है. नाम है उनका अभिसार शर्मा. आजतक पर इस विद्वान ने भी ऐसे ही चीखना चिल्लाना शुरु कर दिया है जैसे बाजपेयी जी और चौरसिया जी जैसे विद्वान करते आए हैँ.

टी.वी. पत्रकारिता का दौर है, मेरे मोहल्ले के परचून के दुकान मे तीन रुपैय्ये चार आने प्रति किलो की दर से विद्वता बिक रही है. मै तो विद्वता खरीद कर विद्वान बन गया. यदि आप भी चाहते हैँ कि आप विद्वान बनेँ, आपको अपने अन्दर से आपकी विद्वता झलके तो टिप्पणी के द्वारा मुझसे सम्पर्क करेँ.

3.11.07

2 फुल्ली फालतू चैनल का कवर स्टोरी: घासी राम की भैँस

पिछले अँक मे आपने पढा: यहाँ क्लिक कीजिए. घासी राम की भैँस ढक्कनपुरवा गांव  से उस समय रस्सी तोडकर तबेले से भाग गयी जब घासी राम अपने दोस्त कल्लू के शवयात्रा मे गया था. टी.आर.पी. महिमा के लिए इसको फ़ुल्ली फ़ालतू नामक एक टी.वी. चैनल पर कवर स्टोरी बना कर दिखाया जा रहा था. चैनल के मालिक गुल्लु को इस खबर से बहुत ज्यादा टी.आर.पी. और एस.एम.एस से बहुत पैसा जोगाड़्ने की उम्मीद थी. कातिल अदाँए वाली निधि खोजी, ओवरटाइम का पैसा नही माँगने वाला टप्पू सँवाददाता और समाचार वाचिका रुपाली अभी-अभे हुए ब्रेक के बाद लौटी हैँ. सुन्दरी नामक भैँस को कवर स्टोरी बनाने के लिए उसको तालाब मे तैराकी का प्रैक्टिस छोडवाकर फुल्ली-फालतू चैनल के स्टूडियो मे रखा गया है. अब आगे पढिए...
ब्रेक के बाद चैनल स्टूडियो मे कुछ नए लोग आते हैँ. टप्पू ने अपने विश्वस्त सूत्रो से पहले ही पक्का कर लिया था कि स्टूडियो मे घासी-राम के भैँस की कहानी पर अपना राय देने वाले सारे लोग अपने अपने क्षेत्र के एक्स्पर्ट है जिनका वर्णन निम्न्लिखित हैँ.
जोखन डाक्टर: जोखन डाक्टर ग्यारह साल पहले १३ लाख मे एम.बी.बी.एस. की डीग्री पढ कर आए थे. शुरु के आठ साल तो चूँगी पर बैठ कर आदमी का डाक्टर बने रहे. आदमी का डाक्टरी तो चली नही गलत दवा देने से पाँच लोगो के मौत का मुकदमा हो गया. तब से अकल ठीकाने आई और फिलहाल पिछले तीन साल से जानवर का डाक्टर बने पडे हैँ. बुजूर्गोँ ने समझाया इसमे रिस्क नही है.
सेवकराम साइको: पहले इनका नाम था सेवकराम शर्मा. पिछले बीस साल से साइकेट्रिक डाक्टर हैँ और अपना बिजिनेस बढाने के लिए अपने नाम के आगे साइको लगाया है. गल्लू से पहुत पहले इनका करार हुआ था. इनको टी.वी. पर लाइव दिखाने पर सेवकराम साइको गल्लू को १० हजार रुपैया देगा.
कालू प्रसाद "देशप्रेमी": आजकल के सत्तारुढ पार्टी का एम.एल.ए और अपने पार्टी का प्रवक्ता. जब से पिछली सरकार ने इनके उपर लगा बलात्कार का आरोप सी.बी.आई से जाँच करने को कहा ये अपने नाम के आगे देशप्रेमी जोड लिया. अभी तो सत्तारुढ़ पार्टी मे हैँ लेकिन विपक्ष कहती है कि लोगों का अटेन्सन दूर करने के लिए अपना नाम के आगे देशप्रेमी लगाए हैँ.
टी.वी.स्क्रीन पर फुल्ली फालतू चैनल फिर से आता है. रुपाली अपने बालोँ की लटो को एक बार फिर से झटकती है और और बोलने लगती है.
रुपाली:  दर्शकोँ हम फिर से हाजिर हैँ घासीराम के सुन्दरी का एक्सक्लूसिव रिपोर्ट लेकर. जैसा कि पहले बताया जा चुका है,  हम दूनिया मे पहली बार इस खबर को प्रसारित कर रहे हैँ कि आखिर घासीराम की सुनदरी भैँस रस्सी तोडकर गयी किधर. जो लोग अभी-अभी टी.वी आन किए है उनके लिए मै बता दूँ कि आज सुबह सुबह ढकनपुरबा गाँव के श्री घासीराम जी जी सुन्दरी नाम की भैँस रस्सी तोडकर भग गई है. हम अपने इस चैनल पर एक्स्क्लूसिवली रिपोर्ट दिखा रहे हैँ कि आखिर सुन्दरी को वह कौन सा बात खराब लग गई जिससे वह घर छोडकर चली गई. क्या उसका किसी से चक्कर था ? या वह किसी मानसिक प्रताडना का शिकार थी. घासीराम के बातोँ से तो यह नही लगता है कि उसने सुन्दरी को भगाया है. आज इसी बात पर चर्चा करने के लिए हमने कुछ एक्स्पर्ट को बुलाया है. आज हमारे साथ मौजूद हैँ, एक जाने माने पशु चिकित्सक श्री जोखन डाक्टर, प्रसिद्ध मनोवैग्यानिक श्री सेवक साइको, और ढकनपुरवा गाँव के स्थानीय विधायक श्री कालू प्रसाद "देशप्रेमी". और हमारे सँवाददाता निधि खोजी मौजूद हैँ घटनास्थल पर. हम समय समय पर दर्शको का राय भी लेते रहेँगे. आप अपना राय टाइप करके हमे भेजेँ. हमारा नम्बर है ४५४७६. तो हम बिना समय गँवाए सीधे मुद्दे पर आते हैँ और पहला सवाल करते हैँ हमारे आज के एक्स्पर्ट सेवकराम साइको जी से.
रुपाली: सेवकराम जी हमारे स्टूडियो मे आपका स्वागत है. आप तो पिछले बीस साल से मनोवैग्यानिक रहे हैँ. आपको क्या लगता है. सुन्दरी की मान्सिक स्थिति कैसी रही होगी. वह घासीराम का घर छोडकर क्योँ भाग गयी.
सेवकराम साइको: रुपाली' जी मुझे अपने स्टूडियो मे बुलाने के लिए धन्यावाद. मुझे तो सुन्दरी का केस पुरा साइकोलोजिकल लगता है. और लगता है कि वह "साइक्लोजिकल डिसओर्डर सिन्ड्रोम" से ग्रसित है. इस तरह के बीमारी मे भैँस क्या आदमी भी अपना घर छोडकर चला जाता है और भी बिना कुछ बताए. अभी हाल मे ही एक औरत अपने पति को छोडकर अपने प्रेमी के साथ भाग गई थी और उसको जाँच करने के बाद पता चला कि वह भी इसी सिन्ड्रोम से ग्रसित थी. 
कालूप्रसाद देशप्रेमी: (  इन सभी का बात काटते हुए बीच मे ही बोल उठा.) रुपाली जी, इसमे मुझे किसी बिमारी का कोई बात नही लगता है. यह तो विपक्षी पार्टी का काम है. घासीराम के भैँस को भगाकर उसमे अल्पसँख्यक वर्ग का नाम बिगाडने की साजिस है. हम यह काम नही होने देँगे. हमारी सेकुलर पार्टी देश मे इस तरह के कम्यूनल पार्टी का पर्दा फास करेँगे.
तभी निधि खोजी का खबर आता है और बीच मे ही रुपाली सबको चुप कराते हुए बोलती है.
रुपाली: दर्शकोँ हमारी संवाददाता अभी ढकनपुरबा गाँव मे मौजूद है. निधि क्या आप मेरा आवाज सुन रही हैँ. क्या माहुल है वहाँ का?
निधि (अपने कान का टेपा सही करते हुए): जी रुपाली पूरा गाँव सुन्दरी के जाने से गमगीन है. पडोस का भैँसा अभी तक चारा नही खाया है. घासी-राम का रो-रोकर हालत खराब है. लेकिन अभी तक स्पष्ट नही हो पाया है कि रुपाली आखिर भागी क्योँ. रुपाली के आस मे सब लोग रास्ता देख रहे हैँ. लोग बोलते हैँ मेरी रुपाली-मेरी रुपाली...
रुपाली: (अचानक घबराकर चौँक जाती है और धीरे से फुसफुसाती है) अरे निधि रुपाली नही सुन्दरी...सुन्दरी... (और भी धीरे से-- स्टूपिड नोन्सेन्स)
निधि (एक ही बार मे स्टूपिड शब्द समझने के बाद फिर से अपने बालोँ को झटकते हुए): जी हाँ रुपाली नही माफ कीजिएगा हम निधि की बात ...ओह सोरी.. घासीराम की भैँस सुन्दरी की बात कर रहे थे. अपने पास खडे हुए यूवक को पूछते हुए. हा~म तो आप मुझे बताएँ कि सुन्दरी क्योँ भागी?
यूवक (कैमरा के बजाए निधि को देखते हुए): वो क्या है मैडम, हम सुबह सुबह मैदान को गए थे. देखो तो उधर से दो भैँस कहीँ जा रहे थे. हमे पक्का विश्वास है कि वह सुन्दरी ही रही होगी. पिछले छओ महीना से उसका पडोस के भैँसे से जबरदस्त चक्कर रहा है. हम तो कई बार समझाए घासी राम को लेकिन उ माने तब ना. जान्बुझ के पडोस के भैसे के सामने मे बान्धता था. ससुरा घासी-राम को बुढापे मे जवानी सुझत रहल है. भैसन के प्रेम सम्बन्ध बनाबे मे मदद करत रहल है. मैने मना किया तो माना नही, अब भुगतो ससूरा, भैस भाग गई ना.
कालू-प्रसाद "देशप्रेमी" (बीच मे ही रुपाली को रोकते हुए): इसमे जरूर विपक्षी पार्टी का हाथ रहा होगा. हमारे क्षेत्र मे से भैस को भगवाकर शान्ति भँग करना चाहते हैँ. हम सेकुलर हैँ. ऐसे कम्यूनल पार्टी को हम नही बक्शेँगे.
बीच मे ही रुपाली सबको रोकते हुए बोलती है. देशप्रेमी जी हम फिर से वापस होते हैँ लेकिन इस छोटे से ब्रेक के बाद. और दौड्कर रेस्ट रूम चली जाती है.

20.9.07

7 प्रतिभा कुलकर्णी का पत्र सोनियाँ के नाम

परम आदरनीय मैडम;

सादर प्रणाम;

मै कुशलपूर्वक रहती हूँ और आशा करती हूँ कि देवी माँ कि कृपा से आप भी कुशलपूर्वक जीवन व्यतीत कर रही होँगी.

आगे बाद समाचार ये है कि मै आपके क्वात्रोची भैया का सारा इन्तेजाम कर दिया है. सी.बी.आई के लोग पहले तो मेरा बात ही नही मान रहे थे, मैने जब उनको खबर पहुँचाया कि इसमे मैडम का पूर्ण सहमति है, तब कहीँ जाकर उनलोगोँ ने सी.बी.आई का रुख आपके क्वात्रोची भैया के लिए ढीला किया. वरना तो इस बार ये लोग उनको भारत मे प्रत्यर्पण करवाने का पूरा मन बना लिया था. अच्छा हुआ कि आपने मुझे समय पर राष्ट्रपति बनाने का निर्णय लिया वरना भगवान जाने आपके भैया का क्या होता.

मैडम, भवन मे मुझे बहुत दिक्कत आती है. वैसे आपके कहे अनुसार यहाँ का स्टाफ मुझे अब नाश्ते मे पोहा का इन्तेजाम कर दिया है. लेकिन क्या है कि मेरे पति अभी तक सिर्फ एक विधायक के पोस्ट पर काम कर र्हे हैँ. यदि मैडम की कृपा हो तो उनको राज्यसभा के लिए निर्वाचित किया जा सकता है. वैसे मैडम जैसा उचित समझें. क्योकि अभी हाल ही मे महारष्ट्र का दौरा जब मेरे पति ने किया था और वहाँ के अधिकारी को ५ कार, एम्बुलेन्स और नाश्ते मे पोहा आ अरेन्ज्मेन्ट करने के लिया उन्होने लिखा था तो विपक्षी पार्टी उनका यह कहकर बदनामी किया था कि वे तो सिर्फ एक विधायक हैँ इतनी खातिरदारी कैसे सम्भव है. है. मैडम शासन चलाना तो कोई आपसे सीखे. मैने भी एक गुड़ आपसे सीखा. वो क्या है मैडम कि जैसा कि आपने देखा होगा मै भी आपकी तरह सिर पर पल्लू रखने का नाटक शुरु कर दिया है, मुझे बहुत अच्छा लगा आपका यह स्टन्ट जनता बहुत आसानी से बेवकूफ बन जाती है, और हमे बाहबाही फ्री मे मिलता है. इसी तरह का कोई और नुश्खा हो तो पत्रोत्तर के माध्यम से सूचित कीजिएगा.

मैडम लेकिन मै यहाँ राष्ट्रपति भवन मे संतुष्ट नही हूँ. वो क्या है कि हमारे जो भूतपूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम थे ना, वो पूरे भवन का माहौल खराब करके चले गये. स्टाफ लोग बदतमीज हो गये. मुझे तो कभी कभी लगता है कि इससे अच्छा तो हम राजस्थान के राजभवन मे ज्यादा खुश थे. यहाँ के स्टाफ रोज शाम को मुझे ई.मेल चेक करने को बोलते हैँ. बताईये इस उमर मे हम ई-मेल चेक करेँ. और बाप रे बाप आजकल के बच्चे भी कितना बदमाश हो गये हैँ. ई-मेल से ही फालतू का प्रश्न पुछते रह्ते हैँ. अभी कल ही एक स्कूल का बच्चा ई-मेल से पूछा कि मैडम आप डा. अब्दूल कलाम के सपनो का विकसित भारत बनाने मे क्या योगदान करना चाहती हैँ. अब मै क्या जवाब बताउँ. स्टाफ पुछने आते हैँ कि इस ई-मेल का जवाब क्या होना चाहिए. वैसे तो मन करता है कि बता देँ भारत विकसित करे चाहे नही, हमारा क्या जाता है, या सोनिया मैडम का ही क्या जाता है?, लेकिन मै तो राष्ट्रपति के पद पर हूँ और डर लगता है कि इससे तो सोनिया मैडमे का बदनामी होगा ना, इसीलिए चूप रह जाती हूँ. बताईए, अब्दुल कलाम जैसे आदमी को राष्ट्रपति बनना चाहिए ? स्टाफ तो स्टाफ आम आदमी का भी हिम्मत हो जाता है भारत के राष्ट्रपति से डाइरेक्ट सवाल पूछने का? उन्होने सबका मन बढ़ा कर रख दिया है.

अभी हाल के दिनो मे बिहार मे बाढ की स्थिति से निपटने के लिए अन्तर्राष्ट्रीय सेमिनार हुआ था. कोई बिहारी मुझे ई-मेल कर दिया कि उस सेमिनार के उद्घाटन के लिए मै जाउँ. और यहाँ के स्टाफ हैँ कि मुझे बिहार जाने के लिए जिद्द कर रहे थे. लेकिन मै भी मैडम का पक्का भक्त ठहरा. सो स्टाफ को बोल दिया, कि नही जाऊँगी. मेरे नही जाने से हो ना हो नीतिश कुमार की बदनामी होगी. और उससे कालू यादव को बाहबाही मिलेगा. और लालू यादव तो ठहरे अपने ही आदमी. मैने स्टाफ को समझाया कि लालू यादव की खुशी मे सोनिया मैडम की खुशी है और सोनिया मैडम की खुशी मे ही मेरा खुशी है. हार कर स्टाफ लोगो को मेरा बात मानना पडा. मैडम शुरु मे तो स्टाफ लोग इतने बदतमीज थे कि मुझे रात मे थोडा बहुत पढाई करने के लिए बोलते थे. अपना भाषण खुद तैयार करने के लिए बोलते थे. अगले महीने के बजट मे राष्ट्रपति भवन के लाईब्रेरी मे कौन सा बुक लाना है, मुझे बताने के लिए बोलते थे. मैने उनको बोल दिया देखो हम कोई विद्यार्थी नही हैँ कि हम राष्ट्रपतिभवन मे पढाई करेँ. जन विद्यार्थी जीवन मे पढाई नही किया तो अब कौन सा पढाई करुँगी? आप ही बताईये ने सोनिया मैडम अब्दुल कलाम ने यहाँ का कितना माहौल खराब कर दिया है. मै धीरे धीरे कोशिश कर रही हूँ की माहैल सामन्य हो जाए.

लेकिन मैडम से एक अनुरोध है कि आप अगली बार किसी भी कीमत पर अब्दुल कलाम जैसे लोगोँ को राष्ट्रपति नही बनाएँ. इस तरह के लोग सारा माहौल खराब करके रख देतेँ हैँ.

पुनश्च: मुझे एक ही चिन्ता सताए जा रही है. मुझे कुछ विश्वत सूत्रोँ से पता चला है कि बँगलोर मे बैठा एक ३० साल का एक लडका सबकी बाट लगाने की सोच रखा है. इस क्रम मे अपने "मेरा बकवास" नामक ब्लोग पर सबका मीट्टी पलित करना शुरु किया है. मैडम से अनुरोध है कि इस पत्र को लीक होने से बचाने का भरसक प्रयास करेँ, अन्यथा इस बार वह हमारी बाट जरूर लगाएगा.