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31.10.09

5 हैलोवीन: अमेरिका मे भूत पिचास और झाड़-फूक का त्योहार

दो साल से खामोशी बरकरार रखने के बाद बकवास का ये दूसरा खेप है. लेकिन अभी तक ये अपने बीटा सँस्करण से आगे नहीँ बढ़ पाया है. इस दूसरे खेप मे मै टीवी पत्रकारोँ की बाट नही लगाउँगा. अब उनका स्तर इस ब्लोग से नीचे गिर गया है. सच्ची ! बकवास अपने आप मे एक परिपूर्ण विधा है. और पत्रकारोँ को बाट लगाने से ही केवल, बकवास फल फूल नही सकता है. लेकिन बकवास के इस द्वितीय सँस्करण को कहीँ ना कहीँ से शुरु करना है. बहुत देर से सोच रहा था क्या लिखूँ...? तो याद आया क्योँ नही अपने अमेरिका प्रवास के बारे मे ही लिखूँ. इस बार के मै अपने अमेरिका प्रवास मे तीन जगह गया हूँ. दो शहर अभी और बाँकी है. अगले दो सप्ताह मे काम निपटा के जल्दीए लौटते हैँ. ये सब मिलाकर मेरा पाँचवाँ प्रवास है, मै जब भी यहाँ आया हूँ, कुछ ना कुछ मुझे अजीबे देखने को मिला है. अक्टूबर मे अन्तिम सप्ताह मे किसी भी पश्चिमी देश मे रहने का ये पहला अवसर है. हमेशा की तरह इस बार भे अजीब अजीब चीजेँ देखने को मिल रही है.



प्रत्येक साल अक्टूबर महीने के अन्तिम सप्ताह से अमेरिका मे त्योहारोँ का दौर शुरु हो जाता है. पहला त्योहार आता है हैलोविन, फिर थैन्क्स गिविँग और उसके बाद क्रिश्मस और नया साल. आपने हैलोविन के अलावा सभी त्योहारोँ का नाम सुन रखा होगा. और आपको ये जानकर बहुत आश्चर्य होगा कि हैलोविन एक ऐसा त्योहार है जिसमे अमेरिकन लोग भूत-प्रेतोँ की पूजा (झाड़-फूक) करते हैँ. यदि सँस्कारित शब्दोँ मे बोलेँ तो यह पूजा करना ही है लेकिन यदि असलियत मे बोलेँ तो यह झाड़ फूक से ज्यादा कुछ नही है. और इस झाड़ फुक के लिए आफिस से बकायदा छुट्टी मिलता है. लेकिन अमेरिकन ठहरे पहले दुनियाँ के लोग. वो ये बात कैसे मानेँगे कि अमेरिका मे भूत प्रेत और जादू टोना होता है. और प्रत्येक चीज मे इन्जोय करने का उनका आदत है, तो भूत-प्रेत के झाड़-फूक से भे ये लोग मस्ती करना नही भूलते. और बात यहाँ तक बढ़ जाता है कि लोग हैलोविन का असली मकसद भूल जाते हैँ.
मैने लिटरेचर खँगालने की कोशिश किया कि आखिर बात क्या है? तो पाया कि, प्राचीन समय से हैलोविन त्योहार के समय मरे हुए लोगोँ की आत्मा को शाँत करने के लिए ऐसा पूजा किया जाता है.

विकीपीडिया के अनुसार "यह एक ऐसी अवधारणा है जिसमे यह माना जाता है कि अक्टूबर के अन्तिम सप्ताह मे इस पृथ्वी लोक मे और स्वर्ग-नरक लोक मे दूरी कम हो जाती है. ये दूरी इतनी कम हो जाती है कि स्वर्ग लोक से अपने अच्छे अच्छे पूर्वज के साथ नरक लोक के भूत, प्रेत और पिचाश पृथ्वी लोक पर विचरण करने लगते हैँ. अमेरिकन लोग अपने पूर्वजोँ के आत्मा का तहे दिल से स्वागत करते हैँ और इसी खुशी मे इस हैलोविन को त्योहार की तरह मनाते हैँ, खुशियाँ मनाते हैँ. लेकिन भूत, प्रेत और पिचाशोँ को भगाने के लिए जादू टोना करते रहते हैँ.

जादू टोना के लिए तरह तरह का हरकत करते हैँ और इसमे सबसे बड़ा काम आता है कद्दू (pumpkin). काद्दू को काटकर उसमे आँख और मुँह के आकार का डिजायन बनाया जाता है. बाँकी चीजोँ को नारँगी और काले रँग से सभी चीजोँ को सजाया जाता है. प्रेतोँ और पिचासोँ को भगाने के लिए बच्चे बुढ़े अजीब अजीब रँग के कपड़े पहनते हैँ. हलाँकि अधिकतम डिजायन काले और नारँगी रँग से होता है.

पूरा व्यवस्था देखने से ऐसा लगता है कि अपने देश ही आ चुके होँ. अमेरिकन लोग भारतीय ओझा की तरह का कपड़ा पहनते हैँ. सभी लोगोँ मे होड़ लगी रहती है कि सबसे बदसूरत कौन दिखता है. ऐसा मानना है कि जितना बदसूरत दिखो बुरी आत्मा उतना ही दूर रहेगा. मैने अपने आफिस के बाहर आज देखा कि कुछ लोक बँगलोर के सिल्क बोर्ड किनारे जो बहुरुपिया होते है उसके जैसा कपड़े पहन रखे हैँ. एक समुह ऐसा था जो हाथो पर पट्टी मरहम और प्लास्टर जैसा कुछ करवा रखा है. बहुत सारे लोग आर्टिफिशियल बाल लगा रखे हैँ.

जब मानवता का विकास हो रहा था तो ऐसा नही है कि अमेरिका मे विकास दर बहुत तेजी से बढ़ा है. इन्टरनेट पर एक आर्टिकल पढ़ रहा था कि द्वितीय विश्व यूद्ध के समय अमेरिका ने परमाणु बम जरूर बना लिया था लेकिन मिरगी का इलाज आयोवा स्टेट यूनिवरसिटी के एजूकेशन विभाग का एक प्रोफेसर अपने झाड़-फूक से ही करता था बाइअबिल के सहयोग से.


आज का बकवास कैसा लगा टिप्पणी द्वारा बताइएगा.

26.2.08

17 अब बड़े बड़े विद्वानों मे मेरा नाम भी शामिल

दोस्तों, आपको बताते हुए मुझे आपार खुशी मिल रही है, कि अब मेरा नाम भी भारत के बड़े बड़े विद्वानो मे शामिल हो जाएगा. मुझे बधाई दीजिए, आप अपने दोस्तों, रिश्तेदारों, सड़क पर चलते हुए आम नागरिक सब को बताइए कि पद्मनाभ अब विद्वान हो गया है. उसके चेहरे से विद्वता झलकती है. यदि आप मेरे मोहल्ले से ताल्लूक रखते हैं तो शर्मा आन्टी, तिवारी अन्टी इत्यादि लोगो को यह बात बता दीजिए कि मै अब विद्वान हो गया हूं. मेरा नाम अब पेपर मे छपवाइए, मेरे नाम से अब आप गली मोहल्ले का नाम रखिए. मेरे नाम से फ्लाईओवर, राष्ट्रीयराजमार्ग इत्यादि का नामकरण कीजिए. ऐँ क्या? आप विद्वानों का सम्मान नही करेंगे? क्या विद्वता इस देश मे नही पूजी जाएगी? आप लोग पढ़े लिखे हैं यदि आप लोग नही विद्वानों का सम्मान करेंगे तो और कौन करेगा.

अब आप पुछेँगे, "ठीक है, ठीक है! हम विद्वानों का सम्मान करेंगे! लेकिन भैय्या एक बात तो बताओ तुम विद्वान तो लगते नही. अपने तीस साल के जिन्दगी मे तुमने ऐसा क्या कर डाला कि हमलोग तुम्हें विद्वान समझने लगें, कौन सा सेब को पेड़ से गिरते हुए देखा है तुमने? जरूर तुमको विद्वान होने का भ्रम हुआ है".

जी नहीं, मुझे विद्वान होने का भ्रम नही हुआ. मैं विद्वान होने ही वाला हूँ. मुझे अभी से एहसास होने लगा है कि मेरे व्यक्तित्व से विद्वता झलकती है. ये और बात है कि मैने किसी सेब को किसी पेड़ से गिरते हुए नही देखा है और न ही मै आधूनिक समाज का नया सिद्धान्त ही दिया हूँ. रोजी रोटी के लिए आम आदमी की तरह भटकता रहता हूँ, लेकिन मेरी अन्तरात्मा ने मुझे एहसास कराया है कि मै विद्वान हूँ. मेरे अवचेतन मस्तिष्क मे यह रच बस गया है कि मै अब विद्वान की सारी विद्वता अपने अन्दर सँजोए हुए हूँ.

अब आप बोलेँगे कि ज्यादा मत पकाओ, सही सही बताओ कि आखिर बात क्या है. नही तो इस ब्लोग को यहीँ पढ़ना छोड़ हम कट लेते हैँ.

जी नही आप ऐसा मत कीजिए, एक विद्वान की विद्वता को इस तरह अपमानित मत कीजिए. चलिए मै आपलोगों को विस्तार से बताता हूँ कि आखिरकार मै विद्वान क्यों?

बचपन से मेरे मस्तिष्क मे एक अवधारणा बैठी थी कुछ लोगों के पेशा के हिसाब से उनको विद्वान बोला जाए. जैसे कि कोई वैज्ञानिक. पहली बार जब अब्दुल कलाम के बारे सुना था कि वे एक वैज्ञानिक हैँ तो मेरा मन उन्हे भी विद्वान समझ लिया था. बचपन के शिक्षा के आधार पर मेरे हिसाब से विद्वानों के श्रेणी मे कुछ और पेशेवर लोग भी आते हैं मसलन बड़े विश्वविद्यालय के प्रोफेसर, बड़े बड़े लेखक, कवि, बड़े बड़े अस्पताल के डाक्टर और पत्रकार.

जी हाँ जब भी मेरे मस्तिष्क मे एक पत्रकार का नाम कौधाँ, चूड़ीदार पैजामा लम्बा कूर्ता और बाटा का चप्पल पहने एक ऐसे शख्स का इमेज सामने आया, जिसके पास दुनियाँ की हर जानकारी होती थी, एक ही पत्रकार जो आन्सटीन के खोज पर अपना ऐसा विचार व्यक्त कर सकता है जिसके बारे मे आइन्स्टीन कभी सोच भी नही सकता था, पत्रकार समाज शास्त्र मे अरस्तू और सूकरात को छक्के छुड़ा दें, एक ऐसा इमानदार चेहरा जो अकेले ही समाज मे क्रान्ति लाने के लिए काफी हो. एक ऐसा व्यक्तित्व जो अपनी इमानदारी के आगे कभी भी ना झुके.

तो मेरी बचपन की दुनियाँ बदल गई और इसमे रहने वाले लोग भी. लेकिन विद्वान वैसे के वैसे ही. विद्वता की परिभाषा अब भी नही बदली. आज भी समाज मे एक वैज्ञानिक विद्वान के नजर से ही देखे जाते हैँ. तो आज भी एक वैज्ञानिक, विश्वविद्यालय के प्रोफेसर, और कवि-लेखक इत्यादि सब विद्वानों के श्रेणी मे ही गिने जाते हैँ. जी हाँ और इस इत्यादि मे पत्रकार महोदय भी शामिल हैँ, खास तौर पर इन टी.वी. मे न्यूज पढने वाले (वाली) सारे पत्रकार.

एक बार आप इन टी.वी न्यूज रीडर के चेहरे को ध्यान से देखिए, सबको यह अन्दर से फील होता हुआ मालूम होगा कि उनके अन्दर विद्वता कूट कूट कर भरी है. परचून के दूकान से अभी अभी डेढ़ किलो विद्वता खरीदकर लाए हैँ और गटा गट अपने अन्दर कर लिए हैँ और वही विद्वता अब दर्शको को फील करबा रहे हैं. आप उनको पोले और मूर्ख प्रेजेन्टर समझते रहेँ, आप अपनी बला से, उनको तो तीन रुपैय्ये चार आने प्रति किलो की दर से विद्वता परचून की दूकानों मे ही मिल जाती है और अपनी विद्वता को फील करवाने के लिए दर्शक मिल ही जाते हैँ.

दोस्तोँ अब विद्वान होने के लिए वर्षोँ का मेहनत नही चाहिए. विद्वान होने के लिए बाल का सफेद होना भी जरूरी नही है. ना ही बहुत पढाई करने की. विद्वान होने के लिए इमानदार भी होना जरूरी नही है. जब पत्रकार लोगोँ ने उस परचून के दूकान का पता हमे दे ही दिया तो मैने सोचा विद्वता अभी सस्ती मिल रही है. अभी खरीद कर अभी विद्वान हो लेते हैँ, ना जाने आगे यदि फिर से विद्वता महगी हो गयी तो मुझे विद्वान होने का मलाल रह ही जाएगा. आजतक पर कुछ दिन पहले पुण्य प्रसून बाजपेई जी विद्वान बने थे, फिर दीपक चौरसिया विद्वान बने हैँ, मैने अभी कल ही देखा है एक नया विद्वान आज-तक पर आया है. नाम है उनका अभिसार शर्मा. आजतक पर इस विद्वान ने भी ऐसे ही चीखना चिल्लाना शुरु कर दिया है जैसे बाजपेयी जी और चौरसिया जी जैसे विद्वान करते आए हैँ.

टी.वी. पत्रकारिता का दौर है, मेरे मोहल्ले के परचून के दुकान मे तीन रुपैय्ये चार आने प्रति किलो की दर से विद्वता बिक रही है. मै तो विद्वता खरीद कर विद्वान बन गया. यदि आप भी चाहते हैँ कि आप विद्वान बनेँ, आपको अपने अन्दर से आपकी विद्वता झलके तो टिप्पणी के द्वारा मुझसे सम्पर्क करेँ.